पर्यावरणीय अनुसंधान का परिवर्तित परिदृश्य

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रिमोट सेंसिंग और बिग डेटा पर्यावरणीय अनुसंधान को बदल रहे हैं, जहाँ क्षेत्रीय कार्य अब बढ़ते हुए कंप्यूटर-आधारित, डेटा-प्रेरित विधियों द्वारा समर्थित या प्रतिस्थापित हो रहा है।

पारंपरिक क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण के साथ पारिस्थितिकी अनुसंधान

  • शास्त्रीय पारिस्थितिकी प्रत्यक्ष क्षेत्रीय अवलोकनों, नमूना संग्रहण और पारिस्थितिक तंत्रों की दीर्घकालिक निगरानी पर आधारित थी।
  • क्षेत्रीय कार्य ने प्रजातियों की अंतःक्रियाओं, आवासीय परिस्थितियों और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं की संदर्भात्मक समझ को भी सक्षम बनाया।
  • ऐसे दृष्टिकोण समय-साध्य, भौगोलिक रूप से सीमित और मानव उपस्थिति पर निर्भर होते हैं, जो संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों को बाधित कर सकते हैं।

प्रौद्योगिकी-प्रेरित पारिस्थितिकी अध्ययन की ओर बदलाव के कारक

  • पारिस्थितिक डेटा का विस्फोट: विश्व स्तर पर एक अरब से अधिक प्राकृतिक इतिहास नमूनों का डिजिटलीकरण किया गया है।
    • आइनेचुरलिस्ट(iNaturalist) और ईबर्ड(eBird)  जैसे प्लेटफ़ॉर्म बड़े पैमाने पर नागरिक विज्ञान डेटा सेट उत्पन्न करते हैं।
    • उपग्रहों, ड्रोन, कैमरा ट्रैप, ध्वनिक सेंसर और पर्यावरणीय डीएनए (eDNA) प्रौद्योगिकियों द्वारा सतत डेटा प्रवाह उत्पन्न होता है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका: एआई स्वचालित प्रजाति पहचान, जनसंख्या ट्रैकिंग और आवास मानचित्रण को सक्षम बनाता है।
    • मशीन लर्निंग मॉडल प्रजातियों के वितरण, ऋतु-परिवर्तन और जलवायु परिवर्तन परिदृश्यों के अंतर्गत जैव विविधता ह्रास का पूर्वानुमान लगाते हैं।
    • जो कार्य पहले वर्षों के क्षेत्रीय अध्ययन की माँग करते थे, उन्हें अब एल्गोरिद्म के माध्यम से बड़े पैमाने पर किया जा सकता है।

प्रौद्योगिकी-प्रेरित पारिस्थितिकी के लाभ

  • वैज्ञानिक और परिचालन लाभ:
    • बड़े स्थानिक और कालिक पैमानों पर मानकीकृत एवं उच्च-रिज़ॉल्यूशन डेटा।
    • नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों में मानव व्यवधान में कमी।
    • गहरे महासागरों, घने वर्षावनों और ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे दूरस्थ एवं खतरनाक वातावरण तक पहुँच।
    • सतत निगरानी, जो अस्थायी क्षेत्रीय यात्राओं की सीमाओं को पार करती है।
  • दक्षता और अनुसंधान उत्पादन:
    • परिकल्पना परीक्षण और डेटा विश्लेषण में तीव्रता।
    • आधुनिक शैक्षणिक प्रोत्साहनों के अनुरूप, जो समय पर प्रकाशनों और वैश्विक डेटा सेटों को प्राथमिकता देते हैं।
    • पारिस्थितिकीविदों, डेटा वैज्ञानिकों और जलवायु मॉडलरों के बीच अंतःविषय सहयोग को सक्षम बनाता है।

चुनौतियाँ

  • पारिस्थितिक अंतर्ज्ञान का ह्रास: प्रकृति के साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव में कमी “अनुभव के विलुप्ति” की ओर ले जाती है, जो पारिस्थितिक नैतिकता और संरक्षण संवेदनशीलता को प्रभावित करती है।
  • डेटा पक्षपात और व्याख्या संबंधी समस्याएँ: पारिस्थितिक डेटा नमूना स्थलों, प्रयुक्त प्रौद्योगिकियों और अंतर्निहित धारणाओं से प्रभावित होते हैं।
    • पर्याप्त क्षेत्रीय सत्यापन के बिना प्रशिक्षित एआई मॉडल गलत वर्गीकरण और संदर्भगत त्रुटियों का कारण बन सकते हैं।
  • प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता: एल्गोरिद्म स्थानीय पारिस्थितिक सूक्ष्मताओं को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, जिन्हें केवल क्षेत्रीय अध्ययनों से देखा जा सकता है।
    • तकनीकी प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय निवेश और तकनीकी क्षमता की आवश्यकता होती है, जिससे विकासशील क्षेत्रों में पहुँच सीमित हो जाती है।
  • श्रम विभाजन: पारिस्थितिकी एक अत्यधिक जटिल अनुशासन में विकसित हो चुकी है, और सभी पारिस्थितिकीविदों से क्षेत्रीय प्राकृतिकविद होने की अपेक्षा करना अब व्यावहारिक नहीं है।

आगे की राह

  • प्रौद्योगिकी-प्रेरित अनुसंधान में नैतिक ढाँचे और संरक्षण उन्मुखता को सुदृढ़ करना।
  • विशेषकर जैव विविधता-समृद्ध विकासशील देशों में डेटा साक्षरता और संगणनात्मक पारिस्थितिकी में क्षमता निर्माण।
  • ऐसी नीतियों को बढ़ावा देना जो खुले अभिगम वाले पारिस्थितिक डेटा को सुनिश्चित करें, साथ ही संवेदनशील आवासों की रक्षा भी करें।

स्रोत: TH

 

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