गाज़ा हेतु ‘शांति परिषद्’: भारत का दृष्टिकोण

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारत सहित कई देशों को गाज़ा हेतु शांति परिषद् (Board of Peace for Gaza) में शामिल होने का हालिया आमंत्रण दिया गया है, जिसका उद्देश्य गाज़ा और व्यापक पश्चिम एशियाई क्षेत्र में शांति, सुरक्षा एवं विकास के लिए एक समग्र ढाँचा स्थापित करना है।
  • भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह अवसरों और निहितार्थों का व्यापक मूल्यांकन करने के बाद प्रतिक्रिया देगा।

गाज़ा हेतु शांति परिषद् के बारे में

  • यह एक प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय शासन और पुनर्निर्माण निकाय है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की 20-बिंदु गाज़ा रूपरेखा (Roadmap for Gaza) के अंतर्गत वर्ष 2026 के प्रारंभ में आरंभ किया गया बताया जाता है।
  • इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) से ‘सिद्धांततः’ समर्थन प्राप्त हुआ है, यद्यपि चीन और रूस ने मतदान से परहेज़ किया, जिससे इसकी संरचना एवं अधिकार क्षेत्र पर उनकी शंकाएँ स्पष्ट होती हैं।
  • भारत, जिसने निरंतर दो-राष्ट्र समाधान और कैदियों की बिना शर्त रिहाई का समर्थन किया है, ने इस योजना का पहले स्वागत करते हुए इसे दीर्घकालिक क्षेत्रीय स्थिरता हेतु ‘व्यवहार्य मार्ग’ कहा था।

उद्देश्य और दृष्टि

  • गाज़ा हेतु शांति परिषद् को एक बहुराष्ट्रीय समन्वय तंत्र के रूप में परिकल्पित किया गया है, जिसका उद्देश्य है:
    • युद्धोत्तर पुनर्निर्माण और पुनर्वास की देखरेख करना;
    • इज़राइल और फ़िलिस्तीन के बीच राजनीतिक समझौते को सुगम बनाना;
    • गाज़ा और व्यापक पश्चिम एशियाई क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति, स्थिरता एवं विकास सुनिश्चित करना;
    • मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण प्रयासों का प्रबंधन करना, जिसमें आधारभूत संरचना, शासन एवं सहायता वितरण सम्मिलित है।
  • ट्रम्प ने इसे अपनी 20-बिंदु रूपरेखा का मुख्य क्रियान्वयन अंग प्रस्तुत किया, जो वर्षों के संघर्ष के बाद गाज़ा को स्थिर करने हेतु एक व्यापक अमेरिकी-प्रेरित पहल है।

संरचना और सदस्यता

  • परिषद् में कथित रूप से 50–60 आमंत्रित विश्व नेता शामिल हैं, जो प्रमुख शक्तियों, क्षेत्रीय पक्षकारों और विकास भागीदारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • इसकी तीन-स्तरीय संरचना है:
    • संस्थापक कार्यकारी परिषद्: जिसकी अध्यक्षता स्वयं डोनाल्ड ट्रम्प करते हैं और उनके पास वीटो अधिकार है।
    • मुख्य शांति परिषद्: जिसमें आमंत्रित राष्ट्राध्यक्ष सम्मिलित हैं, जिनमें भारत भी शामिल है।
    • गाज़ा कार्यकारी परिषद्: जो बुनियादी स्तर पर क्रियान्वयन और मानवीय एजेंसियों के साथ समन्वय हेतु उत्तरदायी है।
  • सदस्यता हेतु वित्तीय योगदान आवश्यक है; राष्ट्र US$1 बिलियन का योगदान कर परिषद् के ट्रस्ट फंड में ‘स्थायी सदस्यता’ प्राप्त कर सकते हैं।

वित्तीय तंत्र

  • परिषद् को एक अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण संघ की भाँति कार्य करने हेतु डिज़ाइन किया गया है।
    • प्रारंभिक वित्तीय कोष US$50 बिलियन से अधिक होने की संभावना है, जो स्वैच्छिक राष्ट्रीय योगदान, खाड़ी देशों और निजी दाताओं से प्राप्त होगा।
    • US$1 बिलियन या उससे अधिक योगदान करने वाले देश प्रारंभिक तीन-वर्षीय अवधि से आगे स्थायी सदस्यता प्राप्त कर सकते हैं।
    • रूस कथित रूप से अपने जमे हुए रूसी परिसंपत्तियों का उपयोग योगदान हेतु करने पर विचार कर रहा है।
  • यह वित्तीय मॉडल मानवीय उद्देश्यों और राजनीतिक प्रभाव के बीच की सीमाओं को धुंधला करने का जोखिम रखता है, जिससे संपन्न राष्ट्र निर्णय-निर्माण शक्ति ‘खरीद’ सकते हैं।

वैश्विक भागीदारी

  • स्वीकृत या समर्थक राष्ट्र: सऊदी अरब, यूएई, क़तर, बहरीन, पाकिस्तान, तुर्की, अज़रबैजान, बेलारूस और कुछ मध्य एशियाई गणराज्य।
  • अस्वीकृत या संदेहास्पद: फ्रांस, नॉर्वे, स्लोवेनिया, स्वीडन।
  • अनिर्णीत: रूस और चीन; भारत अभी मूल्यांकन कर रहा है।
  • इज़राइल का दृष्टिकोण: उसने तुर्की और क़तर को शामिल किए जाने पर आपत्ति जताने के बाद परिषद् में शामिल होने पर सहमति दी।

भारत को गाज़ा हेतु शांति परिषद् में क्यों शामिल होना चाहिए?

  • भारत की वैश्विक कूटनीतिक प्रोफ़ाइल सुदृढ़ करना:
    • भारत की भागीदारी इसे केवल एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर ‘संतुलनकारी शक्ति’ के रूप में स्थापित करती है।
    • यह भारत की छवि को एक जिम्मेदार वैश्विक अभिनेता और शांति के विश्वसनीय समर्थक के रूप में सुदृढ़ करती है।
    • यह भारत की दो-राष्ट्र समाधान, मानवीय राहत और अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत संघर्ष मध्यस्थता की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के अनुरूप है।
    • उच्च-स्तरीय वैश्विक तंत्र का हिस्सा होना भारत की रणनीतिक परिपक्वता और वैश्विक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, जो G20, BRICS एवं SCO में उसकी भूमिका के अनुरूप है।
  • गाज़ा के पुनर्निर्माण एजेंडा पर प्रभाव:
    • परिषद् का सदस्य होने के रूप में भारत परियोजना प्राथमिकताओं पर नीति निर्णयों को आकार दे सकता है।
    • भारतीय कंपनियों (निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल शासन, औषधि) हेतु पुनर्निर्माण अनुबंध सुरक्षित कर सकता है।
    • सतत विकास पहलों के माध्यम से पश्चिम एशिया में भारत की आर्थिक उपस्थिति को सुदृढ़ कर सकता है।
  • पश्चिम एशिया में रणनीतिक लाभ:
    • सऊदी अरब, यूएई, क़तर और बहरीन परिषद् में शामिल हो चुके हैं; भारत की सदस्यता:
      • प्रमुख खाड़ी भागीदारों के साथ संबंधों को सुदृढ़ करेगी।
      • भारत-इज़राइल-अमेरिका-यूएई (I2U2) समूह के अंतर्गत सहयोग को बढ़ाएगी।
      • क्षेत्र में चीन की बढ़ती प्रभावशीलता (BRI और GDI के माध्यम से) को संतुलित करेगी।
    • भारत की भागीदारी पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में उसके प्रभाव को विस्तारित करेगी, जो भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
      • ऊर्जा सुरक्षा (भारत अपनी 55% से अधिक तेल आयात आवश्यकता इस क्षेत्र से पूरी करता है);
      • प्रवासी भारतीयों का कल्याण (खाड़ी देशों में 80 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं);
      • GCC देशों के साथ व्यापार और निवेश साझेदारी।
  • अमेरिका के साथ कूटनीतिक संलग्नता:
    • ट्रम्प का आमंत्रण भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में विश्वास और मान्यता का प्रतीक है।
    • परिषद् में शामिल होना:
      • अमेरिका के साथ रणनीतिक गति को पुनः स्थापित कर सकता है।
      • शुल्क और प्रतिबंधों के कारण रुकी हुई व्यापार एवं प्रौद्योगिकी वार्ताओं के द्वार खोल सकता है।
      • सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर भविष्य की अमेरिकी-नेतृत्व वाली गठबंधनों में भारत की स्थिति को बेहतर बना सकता है।
  • मानवीय नेतृत्व और ग्लोबल साउथ एकजुटता:भारत की भागीदारी इसे ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में पुनः स्थापित करेगी, जो न्याय, विकास और समान शांति का समर्थन करता है।
    • परिषद् के माध्यम से भारत गाज़ा में निष्पक्ष मानवीय राहत हेतु प्रयास कर सकता है।
    • फ़िलिस्तीनी युवाओं के लिए क्षमता-निर्माण और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को प्रोत्साहित कर सकता है।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और स्वास्थ्य साझेदारी में अग्रणी भूमिका निभा सकता है, जैसा कि भारत ने G20 पहलों में किया है।
  • प्रमुख शक्तियों की राजनीति में संतुलन:
    • परिषद् में शामिल होकर भारत अमेरिकी-नेतृत्व वाले गठबंधन और रूस-चीन धुरी के बीच सेतु का कार्य कर सकता है।
    • भारत की व्यावहारिक भागीदारी, पारदर्शिता और समावेशिता की शर्तों के साथ:
      • परिषद् को केवल अमेरिकी-प्रधान उपकरण बनने से रोक सकती है।
      • UN एजेंसियों (UNRWA, UNDP, WHO) के साथ समन्वय का समर्थन कर बहुपक्षीय वैधता सुनिश्चित कर सकती है।
    • यह भारत के बहु-संरेखण (multi-alignment) के विदेश नीति सिद्धांत के अनुरूप है, जो रणनीतिक स्वतंत्रता को संरक्षित रखते हुए वैश्विक प्रभाव को अधिकतम करता है।
  • भविष्य की शांति भूमिकाओं हेतु उदाहरण: भारत की भागीदारी उसकी शांति कूटनीति की परंपरा को पुनर्जीवित करेगी — जो निम्नलिखित ऐतिहासिक भूमिकाओं की पुनरावृत्ति है:
    • न्यूट्रल नेशन्स रिपैट्रिएशन कमीशन (कोरिया)
    • इंटरनेशनल कमीशन फॉर सुपरविजन एंड कंट्रोल (वियतनाम)
    • गाज़ा पुनर्निर्माण तंत्र (2014)
  • निष्क्रमण प्रावधान और लचीली भागीदारी: परिषद् की संरचना वैकल्पिक भागीदारी की अनुमति देती है, जो निम्न स्तरों पर संभव है:
    • एक उच्च-स्तरीय अधिकारी (अनिवार्य रूप से प्रधानमंत्री नहीं);
    • प्रारंभिक तीन-वर्षीय अवधि के बाद परिभाषित निष्क्रमण प्रावधान।
    • यह सुनिश्चित करता है कि भारत की भागीदारी सशर्त और प्रत्यावर्तनीय बनी रहे, जिससे नीति-निर्माताओं को दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं के बिना स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर प्राप्त हो।

भारत को गाज़ा हेतु ‘शांति परिषद्’ में क्यों शामिल नहीं होना चाहिए?

  • फ़िलिस्तीनी संप्रभुता का ह्रास: गाज़ा के लिए किसी भी शासन या ‘शांति’ तंत्र को यदि फ़िलिस्तीनी जनता की स्वतंत्र सहमति के बिना बनाया जाता है, तो उसे वास्तविक शांति नहीं माना जा सकता; यह एक अनुप्रयुक्त न्यास (trusteeship) के समान है।
    • भारत के लिए इस परिषद् में शामिल होना उसकी औपनिवेशिक-विरोधी विरासत और आत्मनिर्णय के उस सिद्धांत से विमुख होना होगा, जिस पर उसकी स्वतंत्रता की कहानी आधारित है।
  • भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का क्षरण: भारत की विदेश नीति एक मूलभूत सिद्धांत पर आधारित है: रणनीतिक स्वायत्तता, अर्थात सभी शक्तियों के साथ संलग्न होने की क्षमता, बिना किसी अधीनता के।
    • वित्तीय प्रलोभनों और भू-राजनीतिक अपेक्षाओं से जुड़ा आमंत्रण स्वीकार करना भारत को एक तटस्थ अभिनेता से बाहरी रणनीति का उपकरण बना सकता है।
  • ग्लोबल साउथ में भारत की विश्वसनीयता पर जोखिम: भारत ने अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिका तक ग्लोबल साउथ में गहरी विश्वसनीयता अर्जित की है, एक ऐसे राष्ट्र के रूप में जो दशकों से औपनिवेशिकता, नियन्त्रण और अन्याय को समझता है।
    • इस परिषद् में शामिल होकर भारत उस विश्वास को तोड़ने का जोखिम उठाएगा, क्योंकि इसे न्याय के बिना संघर्षोत्तर प्रबंधन की वैधता प्रदान करने वाला मंच माना जा रहा है।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

  • भारत गाज़ा की सहायता कर सकता है, बिना परिषद् में शामिल हुए: भारत एक रचनात्मक और स्वतंत्र भूमिका निभा सकता है:
    • UNRWA और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से मानवीय सहायता प्रदान करना।
    • फ़िलिस्तीनी नेतृत्व वाले पुनर्निर्माण प्रयासों का समर्थन करना, जो सहमति और गरिमा को प्राथमिकता देते हों।
    • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जवाबदेही और संयम का समर्थन करना।
    • न्याय पर आधारित, प्रबंधन पर नहीं, राजनीतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने हेतु कूटनीतिक चैनलों का उपयोग करना।
  • भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह अवसरों और निहितार्थों का व्यापक मूल्यांकन करने के बाद प्रतिक्रिया देगा।
    • परिषद् की संरचना में निष्क्रमण प्रावधान और वरिष्ठ अधिकारी स्तर पर प्रतिनिधित्व का विकल्प भागीदारी में लचीलापन प्रदान करता है।
  • अंततः भारत का निर्णय इस पर निर्भर करेगा कि परिषद् भारत के बहुपक्षवाद, रणनीतिक स्वायत्तता और संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित शांति निर्माण की प्रतिबद्धता के सिद्धांतों के साथ किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करती है।
मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] विवेचना कीजिए कि गाज़ा हेतु अमेरिका-समर्थित ‘शांति परिषद्’ (Board of Peace) के प्रति भारत का दृष्टिकोण किस प्रकार उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में उसकी नैतिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन को प्रतिबिंबित करता है।

Source: IE

 

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