पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत वर्तमान में एक दुर्लभ चरण का साक्षी बन रहा है जहाँ राजकोषीय और मौद्रिक दोनों नीतियाँ विस्तारवादी हैं। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य धीमी होती अर्थव्यवस्था में समग्र माँग को पुनर्जीवित करना है, लेकिन इससे महँगाई, नीति असंतुलन और राजकोषीय दबाव का जोखिम भी उत्पन्न होता है।
हाल ही में अपनाई गई प्रमुख नीतियाँ
- वित्त वर्ष 2025–26 के केंद्रीय बजट में ₹11.21 लाख करोड़ का प्रावधान अवसंरचना, कृषि, सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यमों (MSMEs) और डिजिटल कनेक्टिविटी के लिए किया गया (पूंजीगत व्यय पर विशेष बल)।
- घोषित आयकर कटौतियों का उद्देश्य मंदी के दौरान खपत को बढ़ावा देना था।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने मंद होती वृद्धि के बीच उधारी और निवेश को प्रोत्साहित करने हेतु रेपो दर घटाकर 5.5% कर दी।
- RBI के दोहरे लक्ष्य — मूल्य स्थिरता और वृद्धि — ने निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ उत्पन्न कीं:
- उधारी को प्रोत्साहन देने हेतु दरों में कटौती।
- मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण, जिससे खुदरा मुद्रास्फीति 2024–25 में घटकर 4.6% पर आ गई।
- वित्तीय संस्थानों और एनबीएफसी (NBFCs) को तरलता समर्थन।
मुद्दे और चुनौतियाँ
- नीति समन्वय की कमी:यदि दोनों नीतियां बिना समन्वय के एक साथ काम करेंगी तो इससे अर्थव्यवस्था में अत्यधिक उतार-चढ़ाव आ सकता है और मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
- इन नीतियों के बावजूद, वृद्धि धीमी है, ऋण प्रवाह कमज़ोर है और बेरोज़गारी बढ़ रही है।
- माँग की मंद प्रतिक्रिया: कर कटौती के बावजूद लोग व्यय नहीं कर रहे हैं।
- यह युक्तियुक्त अपेक्षा सिद्धांत (Rational Expectations Theory) को चुनौती देता है।
- विस्तारित राजकोषीय घाटे का जोखिम: यदि वृद्धि नहीं होती, तो कर राजस्व घटेगा, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा।
- इस अंतर को समाप्त करने के लिए सरकार को कल्याणकारी व्यय में कटौती करनी पड़ सकती है, जिससे कमजोर वर्गों को क्षति होगी।
- बढ़ती असमानता और कमजोर मज़दूरी: कॉर्पोरेट लाभ बढ़ रहा है लेकिन वास्तविक वेतन स्थिर हैं।
- विस्तारवादी नीतियाँ पूँजी को मज़दूरों की तुलना में अधिक लाभ पहुँचा सकती हैं।
विस्तारवादी नीतियों के अतीत में अपनाए गए उदाहरण
- न्यू डील (1930s): अमेरिका द्वारा महामंदी की प्रतिक्रिया स्वरूप।
- 2008 की वैश्विक वित्तीय संकट के बाद: केंद्रीय बैंकों और अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती और मात्रा आधारित सहजता (Quantitative Easing) — सरकारी प्रतिभूतियों के क्रय द्वारा तरलता बढ़ाई गई।
- भारत में RBI ने 2008 में रेपो दर को 9% से घटाकर अप्रैल 2009 में 4.75% किया।
- जापान की ‘अबे-नोमिक्स’ (2012–2020): तीन स्तंभों वाली रणनीति —
- बैंक ऑफ़ जापान द्वारा मौद्रिक सहजता;
- सरकारी व्यय के माध्यम से राजकोषीय प्रोत्साहन;
- स्थिर अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए संरचनात्मक सुधार।
- कोविड-19 महामारी की प्रतिक्रिया (2020–2021):
- विशाल राजकोषीय प्रोत्साहन — नकद हस्तांतरण, बेरोज़गारी भत्ता और व्यापार ऋण;
- केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती और परिसंपत्ति खरीद में विस्तार। भारत ने ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत ₹20 लाख करोड़ का पैकेज लॉन्च किया। अन्य उपाय:
- रेपो दर को ऐतिहासिक निम्नतर स्तर 4% तक लाना।
- ऋण स्थगन और एनबीएफसी व हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए तरलता समर्थन।
भारत में विस्तारवादी नीतियों के लाभ
- समग्र माँग को बढ़ावा: कर कटौती एवं सार्वजनिक व्यय जैसे विस्तारवादी राजकोषीय उपाय लोगों की आय और खपत को बढ़ाते हैं।
- इसी तरह, कम ब्याज दरें ऋण और निवेश को प्रोत्साहित करती हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में माँग पुनर्जीवित होती है।
- रोज़गारों का सृजन: सरकार द्वारा वित्तपोषित अवसंरचना परियोजनाएँ और MSME समर्थन योजनाएँ विशेष रूप से ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में रोजगार सृजित कर सकती हैं।
- निजी निवेश को प्रोत्साहन: उधारी की कम लागत और बेहतर उपभोक्ता भावना कंपनियों को क्षमता विस्तार, नवाचार एवं भर्ती के लिए प्रेरित कर सकती है।
- वित्तीय बाज़ारों को स्थिरता: RBI द्वारा तरलता इंजेक्शन और NBFCs व बैंकों के लिए ऋण गारंटी वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में सहायक हैं।
- अल्पकालिक आर्थिक राहत: कोविड-19 जैसी आपात स्थितियों में नकद हस्तांतरण और खाद्य सुरक्षा उपायों ने कमजोर वर्गों को तत्काल राहत दी।
आगे की राह
- नीति समन्वय तंत्र को मजबूत करें: RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संस्थागत संवाद स्थापित करें।
- लक्षित हस्तांतरण को प्राथमिकता दें: DBT और मज़दूरी समर्थन योजनाओं को बढ़ाएँ ताकि निचले स्तर से माँग को प्रोत्साहन मिले।
- कर संरचना का समग्र पुनरीक्षण करें: आयकर राहत को अप्रत्यक्ष कर (GST) सरलीकरण के साथ जोड़ा जाए।
- मुद्रास्फीति की सक्रिय निगरानी करें: यदि माँग आधारित मुद्रास्फीति बढ़े तो समय रहते मौद्रिक नीति को सख्त किया जाए।
निष्कर्ष
- विस्तारवादी नीतियों ने विशेषकर संकट के समय में भारत की आर्थिक प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालाँकि, इनकी सफलता समय-निर्धारण, लक्ष्य निर्धारण और समन्वय पर निर्भर करती है।
- नीतिनिर्माताओं को अल्पकालिक प्रोत्साहन और दीर्घकालिक राजकोषीय अनुशासन एवं संरचनात्मक सुधारों के बीच संतुलन साधने की आवश्यकता है ताकि सतत विकास सुनिश्चित हो सके।
राजकोषीय नीति
- यह सरकार द्वारा कराधान और सार्वजनिक व्यय के उपयोग को संदर्भित करती है ताकि अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया जा सके।
- विस्तारवादी राजकोषीय नीति: माँग को प्रोत्साहित करने हेतु सरकारी व्यय बढ़ाना या करों में कटौती करना।
- संकुचनकारी राजकोषीय नीति: अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाली अर्थव्यवस्था को संतुलित करने या राजकोषीय घाटा कम करने के लिए व्यय में कटौती या कर वृद्धि।
- सरकार दीर्घकालिक स्थिरता बनाए रखने हेतु FRBM अधिनियम जैसी राजकोषीय जिम्मेदारी रूपरेखाओं का उपयोग करती है।
मौद्रिक नीति
- यह भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा प्रबंधित होती है और इसमें ब्याज दरों व मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित कर मूल्य स्थिरता एवं विकास में सहयोग देना शामिल होता है।
- विस्तारवादी मौद्रिक नीति: ब्याज दरों को घटाना या खुले बाज़ार संचालन द्वारा तरलता का संचार करना।
- संकुचनकारी मौद्रिक नीति: मुद्रास्फीति पर नियंत्रणपाने हेतु ब्याज दरों में वृद्धि या मुद्रा आपूर्ति में कमी करना।
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