पाठ्यक्रम: GS 2/शासन
समाचार में
- तमिलनाडु सरकार ने उच्च शिक्षा में तृतीय भाषा के शिक्षण को अनिवार्य करने संबंधी यूजीसी परिपत्र का सख्त विरोध किया है।
पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने 1968 में प्रस्तुत तीन-भाषा सूत्र को बनाए रखा है, किंतु इसमें अधिक लचीलापन प्रदान किया गया है।
- पूर्ववर्ती नीति के विपरीत, इसमें हिंदी को अनिवार्य नहीं किया गया है। बच्चों को तीन भाषाएँ सीखनी होंगी, जिन्हें राज्य, क्षेत्र और स्वयं छात्र चुनेंगे, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएँ होंगी।
- नीति मातृभाषा/गृह भाषा और अंग्रेज़ी में द्विभाषी शिक्षण पर बल देती है तथा संस्कृत को एक वैकल्पिक भाषा विकल्प के रूप में रेखांकित करती है।
उद्देश्य
- छात्रों को अंग्रेज़ी और मातृभाषा से परे सीखने के लिए प्रोत्साहित करना, जिससे भाषाई विविधता को बढ़ावा मिले।
- यूजीसी का उद्देश्य तृतीय भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विभाजनों को समाप्त करना है।
- बहुभाषी कौशल को वैश्विक कार्यस्थलों में एक संपदा के रूप में देखा जाता है।
- NEP तीन-भाषा सूत्र का समर्थन करती है ताकि संज्ञानात्मक लचीलापन और सांस्कृतिक जागरूकता विकसित हो सके।
मुद्दे और चुनौतियाँ
- तमिलनाडु जैसे राज्य, जो दो-भाषा नीति का पालन करते हैं, इस परिपत्र को हिंदी अनिवार्य करने का प्रयास मानते हैं, जिससे राजनीतिक और सांस्कृतिक विरोध उत्पन्न होता है।
- अनेक विश्वविद्यालयों में अतिरिक्त भाषा पाठ्यक्रम शुरू करने हेतु योग्य संकाय और अवसंरचना का अभाव है।
- तृतीय भाषा जोड़ने से शैक्षणिक भार बढ़ सकता है, विशेषकर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में।
- वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को गुणवत्तापूर्ण भाषा शिक्षण तक पहुँचने में कठिनाई हो सकती है।
- आलोचकों का तर्क है कि भाषा शिक्षण को अनिवार्य करना राज्यों और संस्थानों की शैक्षणिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।
निष्कर्ष और आगे की राह
- यूजीसी का परिपत्र एक बहुभाषी, सांस्कृतिक रूप से एकीकृत उच्च शिक्षा प्रणाली बनाने का लक्ष्य रखता है, किंतु इसकी सफलता लचीले क्रियान्वयन, क्षेत्रीय भाषा नीतियों के सम्मान और पर्याप्त संसाधनों पर निर्भर करती है।
- एक संतुलित और अनुकूलनीय दृष्टिकोण आवश्यक है ताकि भाषाई विभाजनों को गहराने से रोका जा सके और NEP की समावेशी, समग्र शिक्षा की परिकल्पना को साकार किया जा सके।
Source :TH
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