पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- भारत की विद्युत वितरण कंपनियों ने वित्त वर्ष 2024–25 में सामूहिक कर पश्चात लाभ (PAT) ₹2,701 करोड़ दर्ज किया है।
परिचय
- वितरण कंपनियाँ राज्य विद्युत बोर्डों के विखंडन और निगमितीकरण के बाद कई वर्षों से PAT घाटा दर्ज कर रही थीं।
- यह वितरण क्षेत्र के लिए एक नया अध्याय है और वितरण क्षेत्र की चिंताओं को दूर करने के लिए उठाए गए कई कदमों का परिणाम है।
वितरण क्षेत्र में पहल
- पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS): अवसंरचना आधुनिकीकरण और त्वरित स्मार्ट मीटरिंग के माध्यम से वित्तीय व्यवहार्यता को बढ़ाना।
- अतिरिक्त सावधानी मानदंड: विद्युत क्षेत्र की कंपनियों के लिए वित्त तक पहुँच को प्रदर्शन मानकों की उपलब्धि से जोड़ना ताकि राजकोषीय और परिचालन अनुशासन को बढ़ावा मिले।
- विद्युत नियमों में संशोधन: समय पर लागत समायोजन, विवेकपूर्ण टैरिफ संरचना और पारदर्शी सब्सिडी लेखांकन लागू करना ताकि पूर्ण लागत वसूली सुनिश्चित हो सके।
- विद्युत वितरण (लेखा और अतिरिक्त प्रकटीकरण) नियम, 2025: वितरण कंपनियों में समान लेखांकन और पारदर्शिता लाना ताकि वित्तीय प्रशासन बेहतर हो सके।
- विलंबित भुगतान अधिभार नियम: विद्युत क्षेत्र में समय पर भुगतान के माध्यम से कानूनी अनुबंधों को लागू करना, जिससे नए नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश को समर्थन मिले।
भारत का विद्युत क्षेत्र
- भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा विद्युत उत्पादक और उपभोक्ता है, जिसकी स्थापित क्षमता जून 2025 तक 476 GW है।

- भारत नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित क्षमता में वैश्विक स्तर पर चौथे स्थान पर, पवन ऊर्जा में चौथे और सौर ऊर्जा में तीसरे स्थान पर है (2025 तक)।
- विद्युत खपत में उद्योग का हिस्सा 41.8% है, इसके बाद घरेलू उपयोग 24.3%, कृषि 17% और वाणिज्यिक उपयोग 8.3% है।
- भारत ने जून 2025 में 250 GW की रिकॉर्ड पीक मांग पूरी की, जो मांग वृद्धि के पैमाने को दर्शाता है।
- भारत ने 2018 तक 100% गाँवों का विद्युतीकरण कर लिया और तब से 2.8 करोड़ से अधिक घरों को ग्रिड से जोड़ा है।
विद्युत क्षेत्र की चिंताएँ
- उच्च ट्रांसमिशन और वितरण हानियाँ: विद्युत चोरी, अपर्याप्त मीटरिंग और पुरानी अवसंरचना के कारण T&D हानियाँ वैश्विक मानकों से कहीं अधिक हैं।
- ईंधन आपूर्ति और ऊर्जा सुरक्षा चुनौतियाँ: कोयले की कमी, लॉजिस्टिक बाधाएँ और आयातित कोयला व गैस पर बढ़ती निर्भरता विद्युत क्षेत्र को वैश्विक मूल्य अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाती है।
- नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण की चुनौतियाँ: सौर और पवन ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी अस्थिरता, ऊर्जा भंडारण की कमी एवं ग्रिड संतुलन समस्याएँ उत्पन्न करती है।
- अपर्याप्त ट्रांसमिशन और ग्रिड अवसंरचना: ट्रांसमिशन नेटवर्क उत्पादन क्षमता की गति से नहीं बढ़े हैं, विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा वाले क्षेत्रों में, जिससे भीड़भाड़ और अक्षम विद्युत निकासी होती है।
- बढ़ती मांग और पीक बिजली की कमी: शहरीकरण, औद्योगीकरण, जलवायु-प्रेरित शीतलन आवश्यकताओं और EV अपनाने से प्रेरित विद्युत की त्व्व्रता से बढ़ती मांग ने पीक क्षमता एवं ग्रिड स्थिरता पर दबाव बढ़ा दिया है।
सरकारी पहल
- राष्ट्रीय सौर मिशन (NSM): 2010 में शुरू किया गया, इसने ग्रिड से जुड़े और ऑफ-ग्रिड सौर ऊर्जा परियोजनाओं सहित सौर क्षमता स्थापना के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए।
- राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष (NCEF): इसे स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों और परियोजनाओं में अनुसंधान एवं नवाचार का समर्थन करने के लिए स्थापित किया गया, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में सहायता करते हैं।
- राष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन: भारत में पवन ऊर्जा के विकास और विस्तार पर केंद्रित। 2030 तक पवन ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य 140 GW रखा गया है।
- वित्तीय समर्थन और प्रोत्साहन:
- बड़े पैमाने पर सौर और हाइब्रिड परियोजनाओं के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण(VGF)।
- सौर PV निर्माण के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना।
- रूफटॉप सौर और ऑफ-ग्रिड प्रणालियों के लिए सब्सिडी।
- ग्रीन पावर ट्रेडिंग को बढ़ावा देने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (RECs)।
- अवसंरचना विकास:
- नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड एकीकरण में सुधार के लिए ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर।
- कृषि पंपों के सौरकरण के लिए PM-KUSUM योजना।
- वितरण कंपनियों को सुदृढ़ करने के लिए पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS)।
- उभरती प्रौद्योगिकियाँ और परियोजनाएँ:
- बैटरी भंडारण, हाइब्रिड प्रणालियों और RTC विद्युत के लिए समर्थन।
- अपतटीय पवन और फ्लोटिंग सौर परियोजनाओं को बढ़ावा।
- हरित हाइड्रोजन विकास के लिए हाइड्रोजन मिशन पर ध्यान।
- अंतरराष्ट्रीय साझेदारी:
- वैश्विक सौर सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत द्वारा शुरू किया गया अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA)।
- स्वच्छ ऊर्जा निवेश और प्रौद्योगिकी के लिए देशों एवं वैश्विक कोषों के साथ सहयोग।
Source: PIB
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