पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की मासिक वृद्धि दर जारी की है, जो घटकर 1.2% रह गई है — यह विगत नौ माह का सबसे निम्नतर स्तर है।
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP)
- यह आर्थिक विकास का एक प्रमुख संकेतक है, जो किसी चुने गए आधार वर्ष के संदर्भ में समय के साथ औद्योगिक उत्पादन के व्यवहार में प्रवृति को मापता है।
- यह किसी विशेष वर्ष में उद्योगों के क्षेत्र में भौतिक उत्पादन में विगत वर्ष की तुलना में सापेक्ष परिवर्तन को दर्शाता है।
- जारीकर्ता: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO)
- मंत्रालय: सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)
- आवृत्ति: मासिक
- आधार वर्ष (वर्तमान में): 2011–12
- IIP के तीन प्रमुख क्षेत्र:
- निर्माण क्षेत्र – 77.6% भार
- खनन क्षेत्र – 14.4% भार
- बिजली क्षेत्र – 8.0% भार
- उपयोग-आधारित वर्गीकरण:
- प्राथमिक वस्तुएं
- पूंजीगत वस्तुएं
- मध्यवर्ती वस्तुएं
- अवसंरचना/निर्माण वस्तुएं
- उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं
- उपभोक्ता गैर-टिकाऊ वस्तुएं
निवेश में तीव्रता नहीं आने के कारण?
- मांग की अनिश्चितता: कोविड-19 महामारी के बाद उपभोक्ता मांग कमजोर रही है, जिससे क्षमता उपयोग कम हुआ है।
- निरंतर मांग वृद्धि के स्पष्ट संकेत के बिना कंपनियां नई क्षमताओं में निवेश करने में अनिच्छुक हैं।
- उद्योग में अतिरिक्त क्षमता: कई क्षेत्र, विशेष रूप से निर्माण, अभी भी अपनी इष्टतम क्षमता से नीचे काम कर रहे हैं। कंपनियाँ पहले वर्तमान ढांचे का पूरा उपयोग करना चाहती हैं।
- वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता: रूस-यूक्रेन युद्ध, रेड सी संकट, वैश्विक मुद्रास्फीति जैसी भू-राजनीतिक घटनाओं ने व्यापार और निवेशकों के विश्वास को प्रभावित किया है।
- क्रेडिट ट्रांसमिशन में धीमापन: कोविड के बाद रेपो दरें कम थीं, लेकिन उद्योग को ऋण वृद्धि हाल तक सुस्त रही।
- बैंक जोखिमपूर्ण औद्योगिक ऋण की बजाय खुदरा ऋण (जैसे आवास और ऑटो) को प्राथमिकता दे रहे थे।
- अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स की बाधाएं: गति शक्ति और पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान जैसे सुधारों के बावजूद भारत में लॉजिस्टिक्स लागत अभी भी अधिक है।
- परियोजना अनुमोदन और भूमि अधिग्रहण में देरी से पूंजी निर्माण धीमा होता है।
- प्रमुख क्षेत्रों में कम FDI: डिजिटल और सेवा क्षेत्रों में FDI प्रवाह अधिक है, लेकिन निर्माण और अवसंरचना में कमजोर है।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के बावजूद विदेशी निवेशक बाज़ार के आकार, व्यापार करने में सुलभता और निकासी विकल्पों को लेकर सतर्क हैं।
- सरकारी पूंजीगत व्यय का विलंबित गुणक प्रभाव: सार्वजनिक निवेश (विशेष रूप से अवसंरचना में) बढ़ा है, लेकिन निजी निवेश पर इसका प्रभाव अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है।
- राज्य स्तर पर पूंजीगत व्यय भी राजकोषीय बाधाओं के कारण कमजोर रहा है।
उठाए गए नीति उपाय
- कॉर्पोरेट कर कटौती (2019): कर दर को 30% से घटाकर 22% किया गया, जिससे निजी क्षेत्र की लाभप्रदता और निवेश को बढ़ावा देने का लक्ष्य था।
- पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी: हालिया बजटों में सरकार ने अवसंरचना पर व्यय बढ़ाया है ताकि मांग को प्रोत्साहित किया जा सके और निजी निवेश को आकर्षित किया जा सके।
- मौद्रिक सहजता: RBI ने ब्याज दरों में कटौती की ताकि उधारी लागत कम हो और तरलता में सुधार हो।
निष्कर्ष
- भारत में औद्योगिक और निवेश की मंदी मुख्यतः मांग-पक्ष की कमजोरी से जुड़ी है, न कि केवल आपूर्ति या वित्तीय बाधाओं से।
- निजी क्षेत्र मांग की स्पष्टता का इंतजार कर रहा है — निवेश मांग की पुनरुद्धार से पहले नहीं हो सकता।
- इसलिए, केवल कर कटौती और ब्याज दरों में बदलाव से आगे बढ़कर, एक समन्वित नीति दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो मौद्रिक और राजकोषीय मांग प्रबंधन पर आधारित हो।
Source: TH
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