पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- केंद्रीय बजट 2026-27 में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय का अनुमान ₹12.2 लाख करोड़ लगाया गया है, जो FY18 में ₹2.63 लाख करोड़ था।
केंद्रीय बजट 2026-27 में पूंजीगत वस्तु क्षेत्र हेतु प्रमुख घोषणाएँ
- सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में वृद्धि: FY 2026–27 में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ₹12.2 लाख करोड़ प्रस्तावित है, जो अवसंरचना-आधारित वृद्धि को सुदृढ़ करता है तथा परिवहन, ऊर्जा, शहरी अवसंरचना एवं उद्योग जैसे क्षेत्रों में पूंजीगत वस्तुओं की माँग को समर्थन देता है।
- सटीक विनिर्माण हेतु हाई-टेक टूल रूम्स: केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (CPSEs) द्वारा दो स्थानों पर हाई-टेक टूल रूम्स की स्थापना, जो डिज़ाइन, परीक्षण और उच्च-सटीकता वाले घटकों के विनिर्माण हेतु डिजिटल रूप से सक्षम, स्वचालित सेवा केंद्र के रूप में कार्य करेंगे।
- निर्माण और अवसंरचना उपकरण (CIE) संवर्धन योजना: उच्च-मूल्य, तकनीकी रूप से उन्नत निर्माण और अवसंरचना उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करने हेतु एक समर्पित योजना का शुभारंभ।
- इसमें लिफ्ट, अग्निशमन प्रणाली, सुरंग-खोदने वाली मशीनें, मेट्रो और उच्च-ऊँचाई वाली सड़क परियोजनाओं हेतु मशीनरी शामिल है।
- कंटेनर विनिर्माण योजना: पाँच वर्षों में ₹10,000 करोड़ की योजना का शुभारंभ, जिसका उद्देश्य भारत में वैश्विक प्रतिस्पर्धी कंटेनर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना है।
- यह आयात पर निर्भरता कम करने और लॉजिस्टिक्स, व्यापार तथा बंदरगाह अवसंरचना को समर्थन देने का लक्ष्य रखती है।
- टोल विनिर्माण हेतु कर प्रोत्साहन: बांडेड ज़ोन में कार्यरत टोल निर्माताओं को पूंजीगत वस्तुएँ, उपकरण या टूलिंग आपूर्ति करने वाली गैर-निवासी संस्थाओं को पाँच वर्षों के लिए आयकर छूट।
- इसका उद्देश्य पूंजी लागत को कम करना और भारत में अनुबंध विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
- ऊर्जा संक्रमण हेतु समर्थन: बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिए लिथियम-आयन सेल निर्माण में प्रयुक्त पूंजीगत वस्तुओं पर मूल सीमा शुल्क छूट का विस्तार।
- यह भारत के स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करता है।
- महत्त्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण: भारत में महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण हेतु आवश्यक पूंजीगत वस्तुओं पर सीमा शुल्क छूट।
- इसका उद्देश्य घरेलू मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण और ऊर्जा व संसाधन सुरक्षा को बढ़ाना है।
- PLI और प्रतिस्पर्धात्मकता योजनाओं के साथ निरंतर संरेखण: बजट उपाय चल रही PLI योजनाओं और भारतीय पूंजीगत वस्तु क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मकता संवर्धन योजना के द्वितीय चरण को पूरक करते हैं, जो प्रौद्योगिकी उन्नयन, परीक्षण अवसंरचना और कौशल विकास को समर्थन देते हैं।
पूंजीगत वस्तुएँ क्या हैं?
- ‘पूंजीगत वस्तुएँ’ का अर्थ है कोई भी संयंत्र, मशीनरी, उपकरण या सहायक सामग्री जो वस्तुओं के निर्माण या उत्पादन अथवा सेवाएँ प्रदान करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आवश्यक हो, जिसमें प्रतिस्थापन, आधुनिकीकरण, तकनीकी उन्नयन या विस्तार हेतु आवश्यक वस्तुएँ भी शामिल हैं।
- इनका उपयोग विनिर्माण, खनन, कृषि, मत्स्य पालन, पशुपालन, पुष्पकृषि, उद्यानिकी, मछली पालन, पोल्ट्री, रेशम पालन और अंगूर उत्पादन के साथ-साथ सेवा क्षेत्र में भी किया जा सकता है।
भारत में पूंजीगत वस्तुओं का महत्व
- औद्योगिक और विनिर्माण वृद्धि की नींव: पूंजीगत वस्तुएँ इस्पात, सीमेंट, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण हेतु आवश्यक मशीनरी एवं उपकरण प्रदान करती हैं।
- FY26 की दूसरी तिमाही में विनिर्माण GVA वृद्धि 9.13% तक तीव्र हुई, जिसमें पूंजीगत वस्तुओं की उपलब्धता और निवेश का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
- अवसंरचना विकास का चालक: सड़कें, रेलमार्ग, बंदरगाह, विद्युत संयंत्र, मेट्रो और नवीकरणीय ऊर्जा सुविधाएँ जैसे बड़े पैमाने की अवसंरचना परियोजनाएँ निर्माण उपकरण, विद्युत मशीनरी एवं भारी इंजीनियरिंग उत्पाद जैसी पूंजीगत वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भर हैं।
- अर्थव्यवस्था पर मजबूत गुणक प्रभाव: पूंजीगत वस्तु क्षेत्र का उच्च गुणक प्रभाव है, क्योंकि इस क्षेत्र में निवेश विनिर्माण, खनन, कृषि, सेवाएँ और लॉजिस्टिक्स में माँग को उत्प्रेरित करता है।
- निवेश और आर्थिक गति का संकेतक: पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन और आयात अर्थव्यवस्था में निवेश गतिविधि के बैरोमीटर माने जाते हैं। दिसंबर 2025 में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में पूंजीगत वस्तुएँ 8.1% वार्षिक वृद्धि दर्ज की गईं।
- निर्यात वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता का समर्थन: घरेलू पूंजीगत वस्तु क्षमता के विस्तार ने भारत के निर्यात प्रदर्शन को सुदृढ़ किया है। FY24 के ₹31,621 करोड़ से बढ़कर FY25 में पूंजीगत वस्तुओं का निर्यात ₹33,356 करोड़ हो गया।
- सरकारी योजनाओं के अंतर्गत विकसित प्रौद्योगिकियाँ फ्रांस, बेल्जियम और क़तर में बाज़ार पा चुकी हैं, जो बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाती हैं।
- प्रौद्योगिकी उन्नति और नवाचार का सक्षमकर्ता: पूंजीगत वस्तुएँ उच्च-सटीकता और उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, तथा उद्योग–शैक्षणिक सहयोग तथा स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करती हैं।
- रोजगार सृजन का उत्प्रेरक: पूंजीगत वस्तु विनिर्माण कौशल-प्रधान है, जो इंजीनियरिंग, डिज़ाइन, निर्माण, परीक्षण और अनुरक्षण में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न करता है।
- पूंजीगत वस्तुओं से संबंधित PLI योजनाओं ने सितंबर 2025 तक 12.6 लाख से अधिक रोजगारों में योगदान दिया है।
- ऊर्जा संक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा में रणनीतिक भूमिका: यह क्षेत्र भारत के ऊर्जा संक्रमण और महत्त्वपूर्ण खनिज मूल्य श्रृंखलाओं को सक्षम बनाता है, जैसे:
- लिथियम-आयन बैटरियों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों का निर्माण;
- पूंजीगत वस्तुओं पर सीमा शुल्क छूट के माध्यम से महत्त्वपूर्ण खनिजों का प्रसंस्करण।
मुख्य समस्याएँ और चिंताएँ
- निजी क्षेत्र में पूंजी निर्माण की कमजोरी: भारत में निजी निवेश और कॉर्पोरेट पूंजीगत व्यय असमान एवं सतर्क है, जो कुछ क्षेत्रों तक सीमित है, जबकि MSMEs को दीर्घकालिक वित्त तक सीमित पहुँच है।
- वित्तपोषण बाधाएँ और पूंजी लागत: उच्च उधारी लागत, दीर्घावधि वित्त की सीमित उपलब्धता और गहरे कॉर्पोरेट बॉन्ड बाज़ारों के अभाव से पूंजी निवेश प्रभावित होता है।
- अवसंरचना बाधाएँ और परियोजना विलंब: भूमि अधिग्रहण चुनौतियाँ, पर्यावरणीय और नियामक स्वीकृतियाँ, अनुबंध प्रवर्तन में विलंब परियोजना लागत बढ़ाते हैं तथा निवेश दक्षता घटाते हैं।
- कौशल अंतराल और उत्पादकता बाधाएँ: पूंजी-प्रधान क्षेत्रों को अत्यधिक कुशल श्रम की आवश्यकता होती है, किंतु भारत में उन्नत तकनीकी और ‘नवयुगीन’ कौशल की कमी है।
- क्षेत्रीय और औद्योगिक असमानताएँ: पूंजी निवेश कुछ राज्यों और शहरी केंद्रों में केंद्रित है, जबकि पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सीमित है। इससे असमान विकास और राष्ट्रीय क्षमता का अपर्याप्त उपयोग होता है।
- आयात पर निर्भरता और बाहरी जोखिम: भारत पूंजीगत वस्तुओं और उन्नत प्रौद्योगिकियों के आयात पर निर्भर है, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा एवं भारी इंजीनियरिंग में। इससे विनिमय दर अस्थिरता और भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ते हैं।
- सततता और पर्यावरणीय चिंताएँ: बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश पर्यावरणीय क्षरण, अवसंरचना की कार्बन तीव्रता एवं परिसंपत्तियों की जलवायु सहनशीलता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
- विकास और सततता के बीच संतुलन बनाए रखना एक प्रमुख नीतिगत चुनौती बनी हुई है।
निष्कर्ष
- भारत का पूंजीगत वस्तु क्षेत्र उसकी निवेश-आधारित विकास रणनीति का एक केंद्रीय स्तंभ बनकर उभर रहा है।
- यह क्षेत्र औद्योगिक क्षमता को सुदृढ़ कर रहा है, अवसंरचना निर्माण को तीव्र गति दे रहा है, और सतत सार्वजनिक निवेश, लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों तथा बजट 2026–27 की पहलों द्वारा समर्थित भारत की दीर्घकालिक आर्थिक गति एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ कर रहा है।
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