पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- हाल ही में कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में राज्य विधानसभा सत्रों के दौरान राज्यपालों के वॉकआउट ने राज्यपाल के विवेकाधिकार बनाम निर्वाचित सरकारों के अधिकार पर संवैधानिक परिचर्चा प्रारंभ कर दी है।
- ये घटनाएँ अनुच्छेद 176 (राज्यपाल का अनिवार्य अभिभाषण) और अनुच्छेद 163 (मंत्रिपरिषद की सहायता और परामर्श) की सीमाओं की परीक्षा लेती हैं।
राज्यपाल के बारे में
- राज्यपाल राज्य का मुख्य कार्यकारी प्रमुख होता है और राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर एवं मुहरयुक्त वारंट के माध्यम से नियुक्त किया जाता है।
- यह एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है और केंद्र सरकार के नियंत्रण में या उसके अधीनस्थ नहीं होता।
राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति
- अनुच्छेद 176(1) के अनुसार राज्यपाल प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के प्रारंभ में विधान सभा (या जहाँ विधान परिषद है वहाँ दोनों सदनों) को संबोधित “करेंगे”।
- यह अभिभाषण विधानमंडल को उसके आह्वान के कारणों से अवगत कराता है और निर्वाचित सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करता है।
- यह राज्यपाल की व्यक्तिगत राय नहीं होती, बल्कि मंत्रिपरिषद की सहायता और परामर्श का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे यह एक औपचारिक कार्यकारी कार्य बनता है, न कि विवेकाधीन।
| राज्यपाल की प्रमुख शक्तियाँ कार्यपालिका संबंधी शक्तियाँ: – वे मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं। ये मंत्री उनके प्रसादपर्यंत पद पर बने रहते हैं। – वे राष्ट्रपति को राज्य में संवैधानिक आपातकाल लागू करने की अनुशंसा कर सकते हैं। – राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के दौरान राज्यपाल राष्ट्रपति के अभिकर्ता के रूप में व्यापक कार्यकारी शक्तियों का आनंद लेते हैं। – डॉ. अंबेडकर ने राज्यपाल को एक निष्पक्ष जनप्रतिनिधि के रूप में परिकल्पित किया था, न कि स्वतंत्र कार्यकारी के रूप में। विधायी शक्तियाँ : अनुच्छेद 200 के अंतर्गत, जब राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल को भेजा जाता है, तो वे: – अनुमोदन प्रदान कर सकते हैं: जिससे विधेयक कानून बन जाता है। – अनुमोदन रोक सकते हैं: जिससे विधेयक कानून बनने से रुक जाता है। – पुनर्विचार हेतु वापस भेज सकते हैं: राज्यपाल विधेयक को सुझावों सहित वापस भेज सकते हैं। किंतु यदि विधानमंडल बिना संशोधन के पुनः पारित कर देता है, तो राज्यपाल अनुमोदन देने के लिए बाध्य होते हैं। – राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु सुरक्षित रख सकते हैं: यदि विधेयक संविधान के विपरीत है, उच्च न्यायालय की शक्तियों को प्रभावित करता है या केंद्रीय कानूनों से विरोधाभासी है, तो राज्यपाल इसे राष्ट्रपति के निर्णय हेतु सुरक्षित रख सकते हैं। |
चिंताएँ
- संवैधानिक जनादेश का क्षरण: अनुच्छेद 176(1) के अंतर्गत राज्यपाल का चयनात्मक पाठ या अभिभाषण से वॉकआउट इस प्रावधान की अनिवार्यता का उल्लंघन करता है और निर्वाचित सरकार तथा विधानमंडल के बीच औपचारिक संचार की संवैधानिक योजना को कमजोर करता है।
- संसदीय संप्रभुता के लिए खतरा: नियमित कार्यकारी कार्यों में विवेकाधिकार का विस्तार राज्यपाल को समानांतर प्राधिकरण के रूप में कार्य करने का जोखिम उत्पन्न करता है, जिसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय बार‑बार चेतावनी दे चुका है कि इससे संसदीय लोकतंत्र अस्थिर हो जाएगा।
राज्यपाल की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण
- शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): न्यायालय ने स्थापित किया कि राज्यपाल औपचारिक प्रमुख हैं जिन्हें मंत्रिपरिषद की सहायता और परामर्श पर कार्य करना चाहिए, स्वतंत्र प्राधिकारी नहीं।
- न्यायालय ने कहा कि ऐसा पदाधिकारी यदि सार्वजनिक रूप से मंत्रिमंडल की नीति की आलोचना करता है तो यह “असंवैधानिक भूल” है जो संसदीय प्रणाली का उल्लंघन है।
- नाबम रेबिया एवं बामांग फेलिक्स बनाम उपाध्यक्ष (2016): न्यायालय ने निर्णय दिया कि राज्यपाल एक औपचारिक प्रमुख हैं और अनुच्छेद 163 के अंतर्गत उन्हें मंत्रिपरिषद की सहायता और परामर्श पर कार्य करना चाहिए, विवेकाधिकार केवल विशिष्ट संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित है।
- तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (2025): न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल का विवेकाधिकार जिम्मेदार निर्वाचित सरकार को नकार या बाधित नहीं कर सकता।
आगे की राह
- सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना: राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच नियमित परामर्श जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ टकराव को कम कर सकती हैं।
- संवैधानिक पाठ और परंपराओं का पालन: राज्यपालों को संविधान और स्थापित परंपराओं के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, विशेषकर विधेयकों पर अनुमोदन एवं विधानमंडल को संबोधित करने के मामलों में।
- सरकारिया और पंची आयोग की सिफारिशों पर पुनर्विचार: दोनों आयोगों ने इस बात पर बल दिया कि राज्यपालों को निष्पक्ष रहना चाहिए और संवैधानिक सीमाओं के अंदर ही कार्य करना चाहिए।
Source: TH
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